फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी

चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी
फैला के बाहें गले से लगाने आयी ज़िन्दगी ..

खो चुकी थी जो लबों की हंसी
खुद हंस के उसे हंसाने आयी ज़िन्दगी ..

अंधेरी रातों में उजालों की तालाश थी
हर दम उसे जो नया करने की प्यास थी ..

ईक झटका देकर नींद से उसे जगाने आयी ज़िन्दगी
चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी ..

चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी
फैला के बाहें गले से लगाने आयी ज़िन्दगी ….!😊✌

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वाह रे इंसान !

हवा के महल बनाता भी है
मेहनत करता है और छूपाता भी है
वाह रे इंसान !
अपने हाथों से उसी घर को आग लगाता भी है …

कड़कडाती हो धूप तो
भी अच्छी ना लगे
बारिश और तूफानों से
तु घबराता भी है
वाह रे इंसान !
खुदा को अपने फैंसले सुनाता भी है …

मर्जी है तेरी तो ख़ुशी मना
गम जो मिले तो आंसू बहा
तू जलता है किसी की खुशियों से
और ये सब दिखाता भी है
वाह रे इंसान !
खुदा से डरता है
इसलिये सिर झुकाता भी है …

स्वार्थ ही चाहत ,स्वार्थ ही कर्ता
स्वार्थी मन है ,स्वार्थ ही भर्ता
तू खुदा को इसी स्वार्थ से मनाता भी है
वाह रे इंसान !
जैसा नहीं है वैसा नजर आता भी है …

दो पल निकाले कभी प्यार के ??
बिना स्वार्थ के ,बिना अहंकार के ??
जब समां कट गया मौज में
फिर क्यूँ रहा नयी ख़ुशी की खोज में ??

अपनी मुशकिलों से जूूंझता भी है
औरों की मुशकिलें बढ़ा़ता भी है
वाह रे इंसान !
स्वार्थी तो तू है ही
स्वार्थ के सब रंग दिखाता भी है …
वाह रे इंसान !
नफरत के कांटे बोता भी है
महोब्बत के फूल चाहता भी है …

वाह रे इंसान !
स्वार्थी तो तू है ही
स्वार्थ के सब रंग दिखाता भी है ..
वाह रे इंसान !!!!****

Pic credit: Google

कली बन के..Part-2

इन अखियों के सपने सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा **
तू मेरे आगे मैं तेरे पीछे भागूँ
तेरे लिए सारे आराम त्यागूँ..
जो रूठा है मुझसे एक भंवरा
तू आके उसको मना जा..
कली बन के मेरे आंगन में आजा ***
थकी हारी सी बैठी हो जो तु
तो तेरा माथा मैं चूम लूँ ..
तेरी ख़ुशी में नाच लूँ
तेरे संग मैं झूम लूँ ..
सच्ची सी रूह और “दृष्टि ” मेरी बन के
ना डरना कभी तू
रहना सीना तन के ..
हर कली को ना कोई समझे नाजुक
आकर दुनिया को तू सीखा जा ..
कली बन के मेरे आंगन में आजा ****
सूनी सी रातें हैं हलचल भरे दिन
अपने नन्हे कदमों से घरबार सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा *****!!

Note : इस कविता को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखते हूए लिखा गया है ..इसका मात्र उदेश्य व्यक्ति विशेष की भावनायों को शब्दों में पिरोना है …!

चेहरे की चमक…..!

सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..
मैं किसी शतरंज का मोहरा नहीं
ना किसी खेल की ऊमदा खिलाडी हूँ ..
चतुराई से कोसो दूर
मैं तो बस अनाडी हूँ ..
ये रंग का भेद भाव मुझे समझ नहीं आता
मैने इंसान को उसकी इंसानियत से पहचाना..
पहल मैं करू य़ा कोई और करे
पर सही को सही और गलत को गलत माना ..
ये ही मैं हूँ दुनिया से अलग तुमको समझना पढ़ेगा
वरना मैं भी इसी दुनिया की भीड में खोकर रह जाऊंगी..
सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..!!

कली बन के…

इन अंखियों के सपने सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….*
तू सपना सलोना तू मेरा खिलौना
तू होंठों की हंसी तू अखियों का पानी
तू सांवली सलोनी तू कितनी सय़ानी
चाहे तो मेरी निंदिया उड़ा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….** !

मैं ” दृष्टि ” पुकारू य़ा कुछ और कहुं
तू मेरी हो छाया मैं तेरे संग रहूँ
कोमल सा स्पर्श नन्ही सी काया
तुझे सोच के जैसे बचपन याद आया
तू मुझे “अधूरी ” से “पूरी ” बना जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….***!!

To be continued…

Note- इस कविता को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखते हूए लिखा गया है ..इसका मात्र उदेश्य व्यक्ति विशेष की भावनायों को शब्दों में पिरोना है …!

अवसाद..

अवसाद से जूँझ रहे तुम
कुछ ज़िम्मेदारियों का एहसास
तो कुछ लापरवाहियां ले ड़ूबी …!
बेसुध हो होश में होकर भी
अक्सर तुमहे जगाना पड़ता है
कुछ बेमन से लिए फैंसले
तो कुछ तुमहे तन्हाइयां ले ड़ूबी … !

मैं तुम्हारी हर बात मानुँगी
बस तुम पहले जैसे हो जाओ …
मैं बन जाऊंगी तुम्हारी नन्ही गुडिया
बस तुम पहले जैसे थे वैसे हो जाओ …!

तुम पर क्या बीत रही
ये मुझ से बेहतर जाने कौन ?
तुम खुद हो हल हर ऊलझन का
ये मुझ से बेहतर माने कौन ?

मैं तुम्हारे दिल की धडकन् हूँ
तुम मेरी खातिर जी लो ना …
गर कुछ खुशियों में गम है भी
तो उस गम को पी लो ना …!

माना तुमको दर्द है हालातों का
पर रिश्तों में गिले-शिकवे कैसे ?
तुमसे विनती करती हूँ मैं
त पहले जैसे थे हो जाओ वैसे …!

ये अवसाद किसी का ना हुआ
अवसाद सबको ड़ूबो कर जाता है …
तन्हाइयों में कटती है ज़िन्दगी
हर तरफ अंधेरा नजर आता है …!

तुम आ जाओ बाहर अंधेरों से
उजालों में ज़िन्दगी काटो …
रास्ते खुद मिल जायेंगे
हर तरफ जो खुशियाँ बांटो…!

आज वादा करलो अपने आप से
अवसाद को ज़ड़ से खत्म करो …
खुल कर ज़ीयो अब से तुम
ज़िन्दगी में नए रंग भरो …!

Image credit: Google

मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!

छल-कपट और दिखावे की दुनिया ये
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!
जात -पात और भेदभाव से रंगा हुआ
अलग-अलग धर्मों में बंटा एक किस्सा हूँ ..
संगीन जुर्म की बात करूं
य़ा कहुं कहानी प्यार की ,
हर रोज नय़ा घोटाला
और उस पर होती राजनीती ,
बस यही बात अब संसार की ..
बीमार माँ भूखी घर में
माँ के दर्शन को तरसती इच्छा हूँ ,
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!!
कभी ये ख्याल भी आता मन में
कि श्रद्धा नहीं तो पाखण्ड कैसा ,
अगर है श्रद्धा मन में
तो फिर ये प्रचंड कैसा ?,
मैं आस लगाये बैठी हूँ
कि इंसानियत का शोर भी सुनुं कहीं..पर
मैं दुनिया खोलती हैवानियत का भयंकर किस्सा हूँ..
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ
मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!!!

note- मेरा मकसद किसी भी धर्म को य़ा भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है ..मन में उपजी सोच को शब्दों के ज़रिये पड़ने के लिए सबका शुक्रिया !!

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