खवाहिशें

दबी सी रह जाती हैं खवाहिशें पिंजरे में
जब उड़ने को पूरा आसमां नहीं मिलता
कुछ तो छूट ही जाता है समय के साथ
हर खवाहिश को मुक्कम्ल जहां नहीं मिलता

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खवाब

खवाब बसते हैं नैनों में
और अधरों पर मौन है ।
चाह सबमें होती है
और बिन खवाहिश अब कौन है ?

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मुसाफिर

लहरों में गोते खाता मुसाफिर कोई
कभी हंसता रूलाता मुसाफिर कोई
टूट कर बिखर जाता मुसाफिर कोई
रिशते निभाता भूल जाता मुसाफिर कोई
रूठता और मनाता मुसाफिर कोई
आरजू रखता नजर आता मुसाफिर कोई
हद में रहता पार कर जाता मुसाफिर कोई

है न तरह-तरह के मुसाफिर राहों पर
और मंजिल सबकी एक ही
एक ही जगह है मंजिल जब
इसलिये इरादे रखो नेक ही

अहम में डूब जाता मुसाफिर कोई
खुद को ढूंढ लाता मुसाफिर कोई
अनेकों मुसाफिर और सफर अलग
इन सबसे बना है ये गजब सा जग

इस जग से जु़ड.जाता मुसाफिर कोई
इस.जग से जीत जाता मुसाफिर कोई
लहरों में गोते खाता मुसाफिर कोई
कभी हंसता रूलाता मुसाफिर कोई

बुलंद मुकाम..

हालात कैसे भी हों
मुसकुराना ही है..

अंधेरा जितना भी हो
रोशनी को आना ही है..

अभी दीवार सी है कठोर कोई
जिसे एक दिन टूट जाना ही है..

मुकाम बुलंद हौंसलौं तक का रखा है
जैसै तैसे कर के अब निभाना ही है..

हालात कैसे भी हों
मुसकुराना ही है..।।

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अचार जैसे रिश्ते..!

वो अचार के मिट्टी वाले ज़ार
अब कहाँ हैं मिलते ?
ना अचार में पहले जैसी खुशबू ,
कुछ बाजारू सा माहौल है इस तरह
के महक भी हो गयी ऊड़नछूँ ..

रिश्तों का भी यही हाल है ना
ना पकड मजबूत रही
ना पहले जैसी मिठास रही ,
अचार सा ही तो तीखा और खट्टापन है
ना किसी को किसी से कोई आस रही ..

पकड़ को मज़बूत तो मिट्टी ही बनाती है ना
तो कहाँ गयी वो मजबूत पकड़
कुछ अचार जैसे ही तो हो गए ना
रह गयी बाकी तो वो बस अकड़ ..!!

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मुस्कुरा लेता हूँ !! 🙂☺️

वक़्त -बेवक़्त मुस्कुरा लेता हूँ *
कुछ ऐसे दिल को समझा लेता हूँ
रंग चाहे फीके हों य़ा गहरे
ज़िन्दगी में हालात एक जैसे ना ठहरे

कुछ कह देता हूँ कुछ सुन लेता हूँ
बस खट्टे मीठे पल चुन लेता हूँ
कुछ ब्यां करता हूँ कुछ छुपा लेता हूँ
बस वक़्त -बेवक़्त मुस्कुरा लेता हूँ **

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इंसान है तू*****

भेदभाव ना कर
ना जातपात पर ध्यान दे

पहले इंसान है तू
इंसान होने का प्रमाण दे

ये जो प्रमाण माँगा है
ज़रूरी सा है इस युग में

इंसान ही इंसान का दुश्मन
आज के कलयुग में

मैं खिलाफ नहीं दुनियादारी के
बस एक बार देख ले भीतर अपने

हाड्ड मास का तू बना
और खोखले ये तेरे सपने

देख तो सही ज़रा
इंसान होकर इंसान से बैर रखता है

दूसरों से अमृत चाहता है
खुद मन में जहर रखता है

मैं चाहता हूँ इस “मैं ” को हटा दूँ
सर्वगुण सम्पन्न ना सही
इंसान होने का परिचय दूँ !!

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