फिर सिहर उठा मन..

मद्धम सी रोशनी
तीव्र हुई धड़कन
संभाले ना संभला
फिर सिहर उठा मन !

पग -पग जैसे कांटे बिछे
कुछ अलग ही बिरहा दिखे
इसी बिरहा की हुई जैसे जलन
संभाले ना संभला
फिर सिहर उठा मन !

रात्रि का एक पहर
कुछ ढा जाता है कहर
सुबह की हो रोशनी
य़ा तपती हो दोपहर
ये कैसी लगी है अगन
संभाले ना संभला
फिर सिहर उठा मन !

किस बोझ का जंजाल ये
कैसा मेरा हाल ये
उलझता ही जा रहा
जीवन का सवाल ये
ये किस दिशा वायु का चलन
संभाले ना संभला
फिर सिहर उठा मन !

हो कुछ ऐसा अगर
कोई जादू की परी आये
य़ा कुछ हो ऐसा अगर
किसी की दुआ ही लग जाये
कुछ कर्मो खुदा हो
ताकत जो आ जाये बन
संभाले संभल जाये
फिर ना सिहर उठे मन !
संभाले संभल जाये
फिर ना सिहर उठे मन !!

Pic credit : Google

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10 thoughts on “फिर सिहर उठा मन..”

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