चेहरे की चमक…..!

सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..
मैं किसी शतरंज का मोहरा नहीं
ना किसी खेल की ऊमदा खिलाडी हूँ ..
चतुराई से कोसो दूर
मैं तो बस अनाडी हूँ ..
ये रंग का भेद भाव मुझे समझ नहीं आता
मैने इंसान को उसकी इंसानियत से पहचाना..
पहल मैं करू य़ा कोई और करे
पर सही को सही और गलत को गलत माना ..
ये ही मैं हूँ दुनिया से अलग तुमको समझना पढ़ेगा
वरना मैं भी इसी दुनिया की भीड में खोकर रह जाऊंगी..
सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..!!

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कली बन के…

इन अंखियों के सपने सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….*
तू सपना सलोना तू मेरा खिलौना
तू होंठों की हंसी तू अखियों का पानी
तू सांवली सलोनी तू कितनी सय़ानी
चाहे तो मेरी निंदिया उड़ा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….** !

मैं ” दृष्टि ” पुकारू य़ा कुछ और कहुं
तू मेरी हो छाया मैं तेरे संग रहूँ
कोमल सा स्पर्श नन्ही सी काया
तुझे सोच के जैसे बचपन याद आया
तू मुझे “अधूरी ” से “पूरी ” बना जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा ….***!!

To be continued…

Note- इस कविता को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखते हूए लिखा गया है ..इसका मात्र उदेश्य व्यक्ति विशेष की भावनायों को शब्दों में पिरोना है …!

अवसाद..

अवसाद से जूँझ रहे तुम
कुछ ज़िम्मेदारियों का एहसास
तो कुछ लापरवाहियां ले ड़ूबी …!
बेसुध हो होश में होकर भी
अक्सर तुमहे जगाना पड़ता है
कुछ बेमन से लिए फैंसले
तो कुछ तुमहे तन्हाइयां ले ड़ूबी … !

मैं तुम्हारी हर बात मानुँगी
बस तुम पहले जैसे हो जाओ …
मैं बन जाऊंगी तुम्हारी नन्ही गुडिया
बस तुम पहले जैसे थे वैसे हो जाओ …!

तुम पर क्या बीत रही
ये मुझ से बेहतर जाने कौन ?
तुम खुद हो हल हर ऊलझन का
ये मुझ से बेहतर माने कौन ?

मैं तुम्हारे दिल की धडकन् हूँ
तुम मेरी खातिर जी लो ना …
गर कुछ खुशियों में गम है भी
तो उस गम को पी लो ना …!

माना तुमको दर्द है हालातों का
पर रिश्तों में गिले-शिकवे कैसे ?
तुमसे विनती करती हूँ मैं
त पहले जैसे थे हो जाओ वैसे …!

ये अवसाद किसी का ना हुआ
अवसाद सबको ड़ूबो कर जाता है …
तन्हाइयों में कटती है ज़िन्दगी
हर तरफ अंधेरा नजर आता है …!

तुम आ जाओ बाहर अंधेरों से
उजालों में ज़िन्दगी काटो …
रास्ते खुद मिल जायेंगे
हर तरफ जो खुशियाँ बांटो…!

आज वादा करलो अपने आप से
अवसाद को ज़ड़ से खत्म करो …
खुल कर ज़ीयो अब से तुम
ज़िन्दगी में नए रंग भरो …!

Image credit: Google

मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!

छल-कपट और दिखावे की दुनिया ये
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!
जात -पात और भेदभाव से रंगा हुआ
अलग-अलग धर्मों में बंटा एक किस्सा हूँ ..
संगीन जुर्म की बात करूं
य़ा कहुं कहानी प्यार की ,
हर रोज नय़ा घोटाला
और उस पर होती राजनीती ,
बस यही बात अब संसार की ..
बीमार माँ भूखी घर में
माँ के दर्शन को तरसती इच्छा हूँ ,
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!!
कभी ये ख्याल भी आता मन में
कि श्रद्धा नहीं तो पाखण्ड कैसा ,
अगर है श्रद्धा मन में
तो फिर ये प्रचंड कैसा ?,
मैं आस लगाये बैठी हूँ
कि इंसानियत का शोर भी सुनुं कहीं..पर
मैं दुनिया खोलती हैवानियत का भयंकर किस्सा हूँ..
और मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ
मैं इसी दुनिया का हिस्सा हूँ ..!!!

note- मेरा मकसद किसी भी धर्म को य़ा भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है ..मन में उपजी सोच को शब्दों के ज़रिये पड़ने के लिए सबका शुक्रिया !!

Image credit: GOOGLE

कुछ तो सीखती हूँ ..✌👍

बेशक कितनी ही तलाशो मुझमें कमियां
पर सुन लो ज़रा मैं इंसान हूँ
गलती कर के ही सीखती हूँ ..
बुरे से अच्छा करूं
और अच्छे से बहतरीन
थोड़ा डर जाती हूँ
पर सच मानो इस डर से ही सीखती हूँ !

वो और होते हैं
जो हर तरह परफेक्ट होते हैं
ना मैं इस रेस में शामिल
ना है मेरा किसी से मुकाबला ..
मैं अपनी गति से आगे बढती हूँ
और पिछले सफर की अच्छाईयों से सीखती हूँ !!

क्यूँ बन जाऊँ मैं किसी और की तरह
आखिर मेरी अपनी इक हस्ती है
मैं आसमां में उड़ते परिन्दे जैसी
आजाद रहना मेरा शोंक ..
ज़्यादा काबिल तो नहीं किसी मुकाम के
पर हर मुकाम पाकर कुछ ना कुछ तो सीखती हूँ !!!

Pic credit : Google

एे ज़िन्दगी !

एे ज़िन्दगी आ जी लूँ तुझे जी भर के
होंसलों की उडान से उड़ जाऊँ नीले गगन में ..
ख्वाहिशों के बोझ तले क्या जीना
और भी बहुत कुछ है ज़िन्दगी के इस सफर में ..
अक्सर किनारे तक आते आते रह जाती है कश्ती
आखिर माँझी को भी पता है अंत डूब जाने का सबब
शुरू से अंत तक चलेगी संघर्श की कश्ती
तो क्यूँ ना जीऊँ इन्ही पलों को
बताओ क्यूँ रह जाऊँ ख्वाहिशों की अकड़ में ..
एे ज़िन्दगी आ जी लूँ तुझे जी भर के
होंसलों की उडान से उड़ जाऊँ नीले गगन में ..!

बस काफी है !

ईक खूबसुरत लम्हा
और उसका एहसास ,
काफी है मुस्कुराने के लिए ..
एक चाय का प्याला
और तुम्हारे लिखे मेसेज की खुशबू ,
काफी है गुदगुदाने के लिए ..
आज डायरी के एक पन्ने में पढ़े
भावनाओं में लिखे शब्द तेरे ,
एक दिन के सन्मान की फिक्र नहीं
काफी हैं तेरे शब्द मेरे हर दिन के सन्मान के लिए ..!!