दिनचर्या का हिस्सा

ठंडी-ठंडी हवा और मिट्टी की सोंधी खुशबू
उपर से तेरे कदमों की आहट
और मेरा खिडकी से झांकना ..

तुम्हारा दहलीज पर दस्तक देना
और मेरा भाग कर चले आना ..

खामोश रह कर बहुत कुछ कह जाना
और कहते हूए खामोश होना ..

अब कुछ इस तरह दिनचर्या का हिस्सा है
मानो तो खूबसुरत एहसास
ना मानो तो अनसूना किस्सा है ..

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जगह तुम्हारी ही खाली है ..

वो जो बालकोनी में सूनापन है ना
वो जो घर के कोने खाली से हैं ना
उनमें जगह तुम्हारी ही खाली है ..
वो जो बीच की दूरियां सी हैं ना
वो जो थोडी बहुत मजबूरियां सी हैं ना
उनमें याद तुम्हारी ही संभाली है ..

तुम नहीं हो तो
मैं कैसे तुमहे महसूस करती हूँ
तुम्हारी हथेलियों को ले अपनी हथेलियों में
बिलकुल तुम्हारी तरह तुमही से ड़रती हूँ ..
ऐसा क्या है कि तुम हो
फिर भी तुम नहीं हो ..
मुझे महसूस भी होता है
और एहसास भी अच्छे से
के तुम हो भी नहीं
फिर भी यहीं कहीं हो ..

कुछ ने कहा क्या पागलपन है
कुछ तो ये भी समझे
के मैने आपबीती लिखी ..
ये कारवा ज्जबातों का है जनाब
फिर कहानी मेरी रही
य़ा किसी और की दिखी ..

वो जो बाहों को देने वाला सहारा है ना
वो जो घर के आंगन की दहलीज है ना
उनमें जगह तुम्हारी ही खाली है ..
वो जो छोटी छोटी बातें हैं ना
वो जो बिन सोये कट जाती रातें हैं ना
उनमें याद तुम्हारी ही संभाली है ..

यूँ महसूस करवा कर खालीपन दे जाना
ये तो अच्छा नहीं होता
जब आओ तो वक्त लेकर आओ
वादा कर के फिर ना निभाना
ये तो अच्छा नहीं होता ..

वो जो य़ादों की ऐल्बम हैं ना
जो हमारी तस्वीर और अच्छी बनाती है
उनमें जगह तुम्हारी ही खाली है ..
वो जो मनाये जाने वाले त्योहार हैं ना
ज़िनमें रोनक की वजह तुम रहते हो
उनमें याद तुम्हारी ही संभाली है ..

वो जो बालकोनी में सूनापन है ना
वो जो घर के कोने खाली से हैं ना
उनमें जगह तुम्हारी ही खाली है ..
वो जो बीच की दूरियां सी हैं ना
वो जो थोडी बहुत मजबूरियां सी हैं ना
उनमें याद तुम्हारी ही संभाली है ..
😊😊

माओं से जन्नत हैं घर

जिन माओं से जन्नत हैं घर
उन माओं को सलामत रखना खुदा ..

जिन माओं से जन्मी ज़िन्दगियां
उन माओं को लम्बी उम्र देना सदा ..!

बचपन में जो ऊंगली पकड़ चलना सिखाती
वो भी एक रुप “माँ ” का ..

लड़ते झगड़ते जब बीतता बचपन
जो रिश्ते में “बहन ” कहलाये
वो भी एक रुप “माँ ” का ..

बड़े प्यार से जो घर आंगन संभालती
जो रिश्ते में पत्नी /बहु कहलाये
वो भी एक रुप “माँ ” का ..

कितने नाजों से ज़िसे हो पालते
जो रिश्ते में “बेटी ” कहलाये
वो भी एक रुप “माँ ” का ..

कितने रूपों में है “लक्ष्मी ” आयी
हर लक्ष्मी को “लक्ष्मी माँ ” का नाम दिया एे खुदा ..

जिन माओं से जन्नत है घर
उन माओं को सलामत रखना सदा ..

ना रहे मोहताज कोई माँ एक दिन के सम्मान की
सम्मान मिले और हर दिन हर पल का मिले
हर दीवार मिट जाये एे खुदा अब अग्यान की ..

दर्द में भी मुस्कुराना होती है ज़िसकी अदा
उन माओं को सलामत रखना एे खुदा ..

जिन माओं से जन्नत हैं घर
उन माओं को सलामत रखना खुदा ..

जिन माओं से जन्मी हैं ज़िन्दगियां
उन माओं को लम्बी उम्र देना सदा …..!!!

Pic credit : Google

फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी

चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी
फैला के बाहें गले से लगाने आयी ज़िन्दगी ..

खो चुकी थी जो लबों की हंसी
खुद हंस के उसे हंसाने आयी ज़िन्दगी ..

अंधेरी रातों में उजालों की तालाश थी
हर दम उसे जो नया करने की प्यास थी ..

ईक झटका देकर नींद से उसे जगाने आयी ज़िन्दगी
चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी ..

चुपके से कानों में फुसफुसाने आयी ज़िन्दगी
फैला के बाहें गले से लगाने आयी ज़िन्दगी ….!😊✌

वाह रे इंसान !

हवा के महल बनाता भी है
मेहनत करता है और छूपाता भी है
वाह रे इंसान !
अपने हाथों से उसी घर को आग लगाता भी है …

कड़कडाती हो धूप तो
भी अच्छी ना लगे
बारिश और तूफानों से
तु घबराता भी है
वाह रे इंसान !
खुदा को अपने फैंसले सुनाता भी है …

मर्जी है तेरी तो ख़ुशी मना
गम जो मिले तो आंसू बहा
तू जलता है किसी की खुशियों से
और ये सब दिखाता भी है
वाह रे इंसान !
खुदा से डरता है
इसलिये सिर झुकाता भी है …

स्वार्थ ही चाहत ,स्वार्थ ही कर्ता
स्वार्थी मन है ,स्वार्थ ही भर्ता
तू खुदा को इसी स्वार्थ से मनाता भी है
वाह रे इंसान !
जैसा नहीं है वैसा नजर आता भी है …

दो पल निकाले कभी प्यार के ??
बिना स्वार्थ के ,बिना अहंकार के ??
जब समां कट गया मौज में
फिर क्यूँ रहा नयी ख़ुशी की खोज में ??

अपनी मुशकिलों से जूूंझता भी है
औरों की मुशकिलें बढ़ा़ता भी है
वाह रे इंसान !
स्वार्थी तो तू है ही
स्वार्थ के सब रंग दिखाता भी है …
वाह रे इंसान !
नफरत के कांटे बोता भी है
महोब्बत के फूल चाहता भी है …

वाह रे इंसान !
स्वार्थी तो तू है ही
स्वार्थ के सब रंग दिखाता भी है ..
वाह रे इंसान !!!!****

Pic credit: Google

कली बन के..Part-2

इन अखियों के सपने सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा **
तू मेरे आगे मैं तेरे पीछे भागूँ
तेरे लिए सारे आराम त्यागूँ..
जो रूठा है मुझसे एक भंवरा
तू आके उसको मना जा..
कली बन के मेरे आंगन में आजा ***
थकी हारी सी बैठी हो जो तु
तो तेरा माथा मैं चूम लूँ ..
तेरी ख़ुशी में नाच लूँ
तेरे संग मैं झूम लूँ ..
सच्ची सी रूह और “दृष्टि ” मेरी बन के
ना डरना कभी तू
रहना सीना तन के ..
हर कली को ना कोई समझे नाजुक
आकर दुनिया को तू सीखा जा ..
कली बन के मेरे आंगन में आजा ****
सूनी सी रातें हैं हलचल भरे दिन
अपने नन्हे कदमों से घरबार सजा जा
कली बन के मेरे आंगन में आजा *****!!

Note : इस कविता को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखते हूए लिखा गया है ..इसका मात्र उदेश्य व्यक्ति विशेष की भावनायों को शब्दों में पिरोना है …!

चेहरे की चमक…..!

सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..
मैं किसी शतरंज का मोहरा नहीं
ना किसी खेल की ऊमदा खिलाडी हूँ ..
चतुराई से कोसो दूर
मैं तो बस अनाडी हूँ ..
ये रंग का भेद भाव मुझे समझ नहीं आता
मैने इंसान को उसकी इंसानियत से पहचाना..
पहल मैं करू य़ा कोई और करे
पर सही को सही और गलत को गलत माना ..
ये ही मैं हूँ दुनिया से अलग तुमको समझना पढ़ेगा
वरना मैं भी इसी दुनिया की भीड में खोकर रह जाऊंगी..
सब्र का इतना इमतिहां ना लो तुम
ये बनावटी चेहरा तुमको कैसे दिखाऊंगी ..
मेरे चेहरे की चमक सादगी से है
मैं किसी और बनावट से ना सज पाऊंगी ..!!